1990 के बाद भारतीय हिन्दी साहित्य में विभाजन: समकालीन पुनर्कल्पनाएँ, पहचान की राजनीति, हाशिए की आवाज़ें और विश्वविद्यालयों की भूमिका
Author
ज्योति कुमारी , डॉ.आशा
Abstract
1990 के बाद का कालखंड भारतीय हिन्दी साहित्य में गहन सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों और वैचारिक पुनर्संरचना का दौर रहा है। मंडल आयोग की संस्तुतियों, उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण की नीतियों तथा मीडिया और बाज़ार के बढ़ते प्रभाव ने हिन्दी साहित्य की संवेदना और संरचना को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप साहित्य एक समरूप मुख्यधारा से हटकर बहुवचनात्मक स्वरूप में विकसित हुआ। इस काल में अस्मिता की राजनीति, अनुभव-आधारित लेखन और हाशिए के समुदायों की आवाज़ें साहित्य के केंद्र में आईं। दलित, स्त्री, आदिवासी, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों तथा LGBTQ+ समुदायों के लेखन ने पारंपरिक साहित्यिक सौंदर्यशास्त्र और मूल्यांकन मानकों को चुनौती दी, जिससे हिन्दी साहित्य के भीतर वैचारिक विभाजन उभरा। कुछ आलोचकों ने इसे साहित्यिक विघटन माना, जबकि अन्य इसे साहित्य के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। साथ ही विश्वविद्यालयों और अकादमिक संस्थानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है, जिन्होंने पाठ्यक्रम, शोध और आलोचना के माध्यम से इन विमर्शों को वैधता प्रदान की। प्रस्तुत शोध-पत्र प्रतिपादित करता है कि यह विभाजन हिन्दी साहित्य की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक जीवंतता और लोकतांत्रिक चेतना का प्रमाण है।
Keywords
हिन्दी साहित्य, साहित्यिक विभाजन, समकालीन पुनर्कल्पनाएँ, पहचान की राजनीति, दलित एवं स्त्री विमर्श, हाशिए की आवाज़ें, विश्वविद्यालयों की भूमिका
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References