भाग्यवती उपन्यास में स्त्री-जीवन और सामाजिक सरोकार
Author
कु. आकांक्षा बाजपेई
Abstract
‘भाग्यवती’ उपन्यास हिन्दी के आरंभिक उपन्यासों में से एक है। यह उपन्यास स्त्री-शिक्षा के साथ-साथ स्त्री जीवन से जुड़ी विभिन्न समस्याओं को भी सामने लाता है। हिंदी उपन्यास की विकास-यात्रा को समझने के साथ ही स्त्री की एक मुकम्मल छवि तथा उपन्यासों में स्त्री के विविध संदर्भों को समझने की दृष्टि से ‘भाग्यवती’ एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आता है। इसके साथ ही, उन्नीसवीं शताब्दी में स्त्री-शिक्षा के लिए किए जा रहे प्रयासों को भी यह उपन्यास विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करता है। भाग्यवती उपन्यास की प्रमुख स्त्री पात्र भाग्यवती स्त्री जीवन की एक आदर्श छवि प्रस्तुत करती है। परिवार में एक स्त्री को किस रूप में अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए और विपरीत परिस्थितियों में भी उसे किस प्रकार से उनका सामना करना चाहिए, इन सभी बातों पर यह उपन्यास प्रकाश डालता है। आरंभिक दौर के उपन्यासों का स्त्री-सरोकार समझने के दृष्टि से ‘भाग्यवती’ एक महत्वपूर्ण उपन्यास है।
Keywords
स्त्री शिक्षा, उपन्यास विधा, समाज-सुधार, आदर्श छवि, हिन्दी नवजागरण, बाल विवाह, विधवा विवाह, स्त्री जीवन, स्त्री की सामाजिक स्थिति, पति-पत्नी संबंध, उन्नीसवीं शताब्दी।
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References
हिन्दी उपन्यास में जो स्त्री केंद्रित उपन्यासों की जो परंपरा चली उसमें श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा रचित भाग्यवती उपन्यास का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। इससे पूर्व ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ और ‘वामा शिक्षक’ जैसे स्त्री शिक्षा संबंधी उपन्यास लिखे जा चुके थे। “भाग्यवती में 1870 ई. के दशक के समाज का चित्रण देवरानी जेठानी की कहानी अथवा वामा शिक्षक की अपेक्षा अधिक विशेष रूप से मिलता है।” हिंदी के प्रथम उपन्यास को लेकर ‘भाग्यवती’ और लाला श्रीनिवास दास के ‘परीक्षा गुरु’ के बीच साहित्यिक बहस भी रही है, लेकिन इस बात पर पर्याप्त सहमति है कि ‘भाग्यवती’ हिंदी के आरंभिक सामाजिक-सुधारवादी उपन्यासों में एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है। उपन्यास की प्रमुख स्त्री पात्र भाग्यवती के माध्यम से भारतीय स्त्री की एक आदर्श छवि निर्मित करने का प्रयास किया है। आलोचक गोपाल राय के शब्दों में ‘भाग्यवती’ का महत्त्व केवल इस कारण नहीं है कि यह हिंदी उपन्यास की आरंभिक रचनाओं में से एक है, बल्कि इसलिए भी है कि जिस समय स्त्रियों की शिक्षा, विधवा-विवाह, बाल-विवाह और स्त्री-पुरुष समानता जैसे प्रश्न समाज में गहरे विवाद के विषय थे, उस समय इस उपन्यास ने इन मुद्दों को कथा के केंद्र में रखा। इसे भारतीय स्त्रियों में जागृति पैदा करने की दृष्टि से लिखा गया था। उपन्यास में बाल-विवाह का विरोध, विधवा-विवाह का समर्थन, स्त्री-शिक्षा के महत्त्व पर जोर दिया। जिस कारण से यह उस दौर के प्रमुख उपन्यासों में गिना जाता है। हिन्दी उपन्यास की विकास यात्रा और उपन्यास में स्त्रियों की उपस्थिति के प्रस्थान बिन्दु के रूप में भी यह उपन्यास काफी अहम भूमिका के रूप में दिखाई पड़ता है।