बिहार में बाँस उत्पादन तथा पर्यावरण पर प्रभाव: एक समग्र अध्ययन
Author
प्रो. (डॉ.) अनिल कुमार तिवारी, नीलू कुमारी
Abstract
बाँस (Bamboo) को आज विश्व स्तर पर “हरित सोना” (Green Gold) कहा जाता है, क्योंकि यह न केवल आर्थिक दृष्टि से उपयोगी है बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए भी अत्यंत प्रभावी माना जाता है। बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में बाँस उत्पादन की संभावनाएँ व्यापक हैं। राज्य में बाढ़, मृदा अपरदन, भूमि क्षरण, जल-प्रबंधन तथा बेरोजगारी जैसी समस्याएँ मौजूद हैं, जिनके समाधान में बाँस आधारित कृषि-वनिकी (Agroforestry) महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह लेख बिहार में बाँस उत्पादन की स्थिति, इसके विस्तार के कारक, बाँस आधारित उद्योगों की संभावनाएँ तथा पर्यावरण पर इसके सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि बाँस कार्बन अवशोषण, भूमि संरक्षण, जल-संरक्षण, जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन तथा सतत ग्रामीण विकास में सहायक है। हालांकि, एकल प्रजाति आधारित बाँस रोपण, जल उपयोग का असंतुलन, स्थानीय जैव विविधता पर प्रभाव तथा अवैज्ञानिक कटाई जैसी समस्याएँ पर्यावरणीय जोखिम उत्पन्न कर सकती हैं। अतः बाँस उत्पादन को बिहार में वैज्ञानिक प्रबंधन, नीति समर्थन और स्थानीय सहभागिता के साथ आगे बढ़ाना आवश्यक है।
Keywords
बाँस, बिहार, पर्यावरण, कार्बन अवशोषण, मृदा संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, कृषि-वनिकी, सतत विकास।
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References
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