मछुआरे’ उपन्यास में मछुआरा समाज का संघर्ष : एक समाजशास्त्रीय अध्ययन
Author
पिंकी चौहान
Abstract
मलयालम के प्रसिद्ध साहित्यकार तकषी शिवशंकर पिल्लै का उपन्यास ‘मछुआरे’ केवल एक व्यक्ति अथवा एक परिवार की कथा नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मछुआरा समाज के जीवन, संघर्ष, मान्यताओं, रूढ़ियों और सामाजिक अंतर्विरोधों का व्यापक आख्यान है। उपन्यास में समुद्र तटीय समाज की आर्थिक विषमता, धार्मिक विश्वास, जातिगत संरचना, स्त्री-पुरुष संबंध तथा स्त्री की नैतिकता को लेकर निर्मित सामाजिक धारणाओं का मार्मिक चित्रण किया गया है। करूत्तम्मा, परीकुट्टी और पलनी की त्रासदी के माध्यम से लेखक यह दिखाते हैं कि किस प्रकार व्यक्ति का निजी जीवन सामुदायिक मान्यताओं और सामाजिक नियंत्रण से प्रभावित होता है। प्रस्तुत शोध आलेख में उपन्यास के सामाजिक, आर्थिक एवं स्त्री-विमर्श संबंधी पक्षों का विश्लेषण किया गया है।
Keywords
मछुआरा समाज, संघर्ष, स्त्री, रूढ़िवादिता, समुद्र, सामाजिक मान्यता, करूत्तम्मा, परीकुट्टी।
Full Text:
References
- पिल्लै, तकषी शिवशंकर.मछुआरे. अनुवाद : भारती विद्यार्थी. नई दिल्ली : साहित्य अकादमी, प्रथम संस्करण 1954, पुनर्मुद्रण 2014, पृ. 8
- वही, पृ. 12
- वही, पृ. 10
- वही, पृ. 106
- वही, पृ. 123