वैदिक ज्ञान परंपरा और समग्र मानव विकास: भारतीय शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में एक समीक्षात्मक अध्ययन
Author
डॉ. ममता जोशी
Abstract
भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा को केवल सूचनाए व्यावसायिक योग्यता अथवा बौद्धिक दक्षता अर्जित करने का साधन नहीं माना गयाए बल्कि व्यक्ति के शारीरिकए मानसिकए बौद्धिकए नैतिकए सामाजिक तथा आध्यात्मिक विकास की समन्वित प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया गया है। वैदिक एवं उपनिषदिक चिंतन में ज्ञान का उद्देश्य मनुष्य को आत्मबोधए विवेकए अनुशासनए उत्तरदायित्वए सह.अस्तित्व और लोककल्याण की दिशा में उन्मुख करना है। वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बढ़ती परीक्षा.केंद्रितताए मूल्य.संकटए मानसिक तनावए सामाजिक प्रतिस्पर्धा तथा जीवन.कौशल से संबंधित चुनौतियों के संदर्भ में वैदिक ज्ञान परंपरा की समग्र दृष्टि विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी शिक्षा को समग्रए बहुविषयकए मूल्यपरकए अनुभवात्मक तथा भारतीय ज्ञान.परंपरा से संबद्ध बनाने पर बल देती है। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य वैदिक ज्ञान परंपरा में निहित शिक्षा संबंधी प्रमुख सिद्धांतों का विश्लेषण करना तथा शारीरिकए मानसिकए बौद्धिकए भावनात्मकए नैतिकए सामाजिक और आध्यात्मिक मानव विकास में उनकी संभावित भूमिका का परीक्षण करना है। अध्ययन गुणात्मक एवं समीक्षात्मक प्रकृति का है तथा इसके लिए वेदोंए उपनिषदोंए भारतीय शिक्षा.दर्शन से संबंधित प्रामाणिक ग्रंथोंए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020ए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के भारतीय ज्ञान प्रणाली संबंधी दिशानिर्देशों एवं संबंधित समकालीन शोध साहित्य का अध्ययन किया गया है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि वैदिक ज्ञान परंपरा में ज्ञानए चरित्रए आत्म.अनुशासनए गुरु.शिष्य संवादए अनुभवए चिंतनए प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता तथा सामाजिक उत्तरदायित्व को शिक्षा के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार किया गया है। निष्कर्षतः आधुनिक शिक्षा में वैदिक ज्ञान के प्रासंगिक एवं सार्वभौमिक पक्षों का वैज्ञानिकए आलोचनात्मकए समावेशी तथा संदर्भानुकूल समावेश विद्यार्थियों के समग्र विकास में उपयोगी हो सकता है।
Keywords
वैदिक ज्ञान परंपराए भारतीय ज्ञान प्रणालीए समग्र मानव विकासए भारतीय शिक्षा व्यवस्थाए मूल्य शिक्षाए गुरु.शिष्य परंपराए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020ए पंचकोश।
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