International Journal of Advance Research Publication and Reviews

International Journal of Advance Research Publication and Reviews
Peer-Reviewed | Multi-Disciplinary Journal

भारतीय धर्म-दृष्टि में दुःख

Author

डॉ. नाजनी बेगम

Abstract

मानवतावादी चेतना से अनुप्राणित दोनों ही परम्पराओं के अधीनस्थ धर्मों को मूल दृष्टि जीवन और जगत् को आक्रान्त करने वाले ‘दुःख’ पर है । इस लक्ष्य को अपने मैं सन्निवेशित कर जीवन एवं जगत् की दुःख से पूर्णतः निर्निमुक्त किया जाए। लेकिन यह तब तक संभव नहीं है, जब तक कि इसके कारण का सम्यक् बौध नहीं ह ो। एक चिकित्सक तभी व्यक्ति को रोग-मुक्त कर पाता है जब उसे न केवल रोग वरन् रोग के कारण का सम्यक जान होता है। दुःख के कारण सम्बन्धी भारतीय धर्म-परम्परा क ी दृष्टि के उद्बोधन का अर्थ है- इसके अधीनस्थ तीनों प्रमुख धर्मों-हिन्दू, जैन एवं बौद्ध धर्माें-को दुःख के कारण की दृष्टि का अभिप्रकाशन । प्रस्तुत प्रसंग में यही अभिप्रकाशन हमारा लक्ष्य है

Keywords

दुःख, हिन्दू, जैन, बौद्ध, धर्म, ग्रन्थ्

Full Text:

Download Paper PDF

References

1 भग्वद्गीता, 16/5 (टी०) एस० 11 राधा कृष्ण्न, पृ0 266
2 वही, 16/4 पृ0 266 ।
3 वही, 16/40।
4 योगसूत्र, 2/3 ।
5 5 द्वष्टव्य, प्रशस्तपाद मात्य, पृ० 53 ।
6 सांरचकारीका 44, 47 एवं 48।
7 न्यायसूत्र 1/1/2 हिन्दी न्याय दर्शन, वात्स्यान माध्य सहित) पु 4/1/13/6।
8 समयसार, गा० 256 स्वं 1530 आचार्य कुन्दकुन्द, 20 पन्नालाल जैन, पर मनुत प्रभाषक मंडल, वौरिया (गुजरात), 1674
9 द्वष्टव्य, जैन दर्शन, मनन और मीमांस, मुनि नथमल, आर्दश साहित्य संघ, कु (राजस्थान), 1673 पृ० 283
10 समयसार, गा० 157
11 मारतोय दर्शन, खण्ड 10 स० राधाकृष्णन, पृ० 266
12 विर्भग, पु0 126
13 संयुक्तानिकाय, भाग, 1 पू0 37
14 विमंग मूल टीका पू0 106
15 दृष्टव्य, दिव्य जीवन मी अरविन्द, पृ० 58 ।
16 पतंजली, योग सुजप्र्र0-112
17 व्रहदारेण्यक उपनिषद्, 414151/24- पतंजली, योगसूत्र, 2/14

Top